राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए महिलाओं कभागीदारी बेहद जरूरी है। सोमवार (18 अगस्त) को दिल्ली में एक पुस्तक विमोचन समारोह में उन्होंने कहा कि अगर समाज को बदलना है, तो आधी आबादी को इससे बाहर नहीं रखा जा सकता।
उन्होंने बताया कि आरएसएस खुद भी इस विचार का पालन करता है। कई फैसले महिला संगठन राष्ट्र सेविका समिति से बातचीत और समन्वय के बाद ही लिए जाते हैं।
‘संघ में जितने पुरुष, उतनी ही महिलाएं हमारे साथ’
मोहन भागवत ने जयपुर की एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उनसे पूछा गया था, संघ में कितनी महिलाएं हैं। उन्होंने जवाब दिया कि जितने पुरुष स्वयंसेवक हैं, उतनी ही महिलाएँ भी हैं। कोई स्वयंसेवक की मां है, कोई उसकी पत्नी, तो कोई बहन।
उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक इसलिए अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभा पाते हैं क्योंकि उनके परिवार की महिलाएँ उन्हें इसके लिए प्रेरित और सहयोग करती हैं।
राष्ट्र सेविका समिति की भूमिका
RSS प्रमुख ने कहा कि महिलाओं के लिए राष्ट्र सेविका समिति का गठन 1936 में किया गया था। इसका उद्देश्य था कि महिलाएं भी पुरुषों के समानांतर समाज और राष्ट्र के लिए कार्य कर सकें।
भागवत ने साफ कहा कि संगठन महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करता है। कई बड़े फैसले उनकी राय से ही तय होते हैं।
महिलाओं को रूढ़ियों से मुक्त करना जरूरी
इससे पहले जुलाई में भी मोहन भागवत ने कहा था कि महिलाओं को पिछड़ी परंपराओं और रूढ़ियों से मुक्त करना जरूरी है। उन्होंने कहा था कि पुरुष और महिला दोनों ही जीवनभर काम करते हैं, लेकिन महिला आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती है। बच्चों के विकास में उनका योगदान और मार्गदर्शन अहम है।
आरएसएस की शताब्दी की तैयारियां
आरएसएस अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने की तैयारी कर रहा है। 2 अक्टूबर 1925 को संघ की स्थापना हुई थी। इस बार 2 अक्टूबर को गांधी जयंती और विजयादशमी एक ही दिन पड़ रही है।
संघ ने सभी स्वयंसेवकों से शाखाओं में उपस्थिति दर्ज कराने का आह्वान किया है। जहां 100 से ज्यादा स्वयंसेवक होंगे, वहां पथ संचलन निकाला जाएगा।
घर-घर संपर्क अभियान
शताब्दी वर्ष में संघ आम जनता से जुड़ने के लिए “गृह संपर्क अभियान” चलाएगा। इसके तहत स्वयंसेवक 25 से 30 घरों तक जाएंगे और संघ के कार्यों की जानकारी देंगे।
इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में मंडल स्तर पर और शहरी इलाकों में बस्ती स्तर पर हिंदू सम्मेलन होंगे। जिलों में 100 से 200 लोगों की छोटी-छोटी गोष्ठियां भी आयोजित की जाएंगी।
