आगरा का नाम सुनते ही ताजमहल के साथ-साथ ‘पेठा’ मिठाई भी ज़ेहन में आ जाती है। दुनिया भर से ताजमहल देखने आए पर्यटक शहर की इस खास मिठाई को पसंद करते हैं और अपने साथ भी ले जाते हैं। यहां के पेठा उद्योग में करीब 5,000 लोग काम करते हैं और रोज़ लगभग 1,000 किलो पेठा का उत्पादन होता है। इस उद्योग से करीब 500 करोड़ रुपये का है और हज़ारों परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है।
अब यह मशहूर मिठाई का उद्योग संकट में है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आदेश दिया है कि ताजमहल के आसपास बने ताज ट्रेपेजियम जोन (TTZ) में चल रही पेठा फैक्ट्रियों को तीन महीने में बंद करके उन्हें बाहर स्थानांतरित किया जाए। TTZ करीब 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला एक क्षेत्र है, जिसमें ताजमहल समेत आगरा किला और फतेहपुर सीकरी जैसे ऐतिहासिक स्थल आते हैं। सरकार को निर्देश दिया गया है कि उद्योग से जुड़े लोगों के लिए एक पुनर्वास योजना तैयार की जाए, जिससे वे घर और रोजगार दोबारा पा सकें। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 23 सितंबर 2025 को होनी है।
पेठा उद्योग की मुश्किलें और कारोबारी की उम्मीदें
पेठा उद्योग से जुड़े कारोबारियों के लिए संकट गहरा गया है। कई दुकानदारों और फैक्ट्री मालिकों का कहना है कि उनके पास नई जगह खरीदने या नया कारखाना शुरू करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। पहले भी प्रदूषण कम करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। 1996 में TTZ में कोयला इस्तेमाल पर रोक लगी थी। 2013 में कोयला ढोने वाले ट्रक बैन हुए, और 2022 में कोयले से चलने वाली 11 इकाइयों को सील कर दिया गया। अब ज़्यादातर फैक्ट्रियां GAIL गैस या LPG से काम कर रही हैं।
हालांकि सरकार ने पेठा नगरी के लिए वैकल्पिक जगह की योजना बनाई थी, लेकिन कालिंदी विहार (1998) और सिकंदरा (2015) जैसी साइटें कभी पूरी तरह बन नहीं पाईं। कारोबारियों का कहना है कि अगर ये फैक्ट्रियां बंद हुईं, तो हज़ारों परिवार बेरोजगार हो जाएंगे। उन्होंने सरकार से गुहार लगाई है कि रियायती दरों पर जमीन और सब्सिडी मिले, तभी उद्योग बच सकता है।
कुल मिलाकर, आगरा के पेठा कारोबारियों के सामने विकट चुनौती है। पेठा उत्पादन की परंपरा, अब कोर्ट के आदेश के कारण संकट में है और इसका भविष्य सरकार की पुनर्वास सुनवाई पर टिका हुआ है।




