जानकीपुरम जमीन घोटाले में विजिलेंस ने बड़ी कार्रवाई की है। महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव की मां और लखनऊ नगर निगम की पूर्व अधिकारी अंबी बिष्ट समेत लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) के पांच तत्कालीन अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज किया गया है। विजिलेंस ने इनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और आपराधिक साज़िश रचने की धाराओं के तहत केस दर्ज किया है।
सपा सरकार के समय हुआ ये घोटाला
दरअसल, यह पूरा मामला जानकीपुरम की प्रियदर्शिनी भूखंड योजना से जुड़ा है। इस योजना में भूखंड आवंटन और पंजीकरण में गड़बड़ियों की शिकायत लंबे समय से उठती रही थी। वर्ष 2016 में शासन ने विजिलेंस को इस मामले की जांच सौंपी थी। उस समय सपा की सरकार उत्तर प्रदेश में थी।
जांच में खुलासा हुआ कि 2010 से 2016 के बीच भूखंडों के फर्जी आवंटन किए गए, दस्तावेजों में हेराफेरी की गई और योजना के नियमों का उल्लंघन कर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया गया। यह पूरा घोटाला सपा सरकार के दौरान सरकार में रहे लोगों के करीबी रहे लोगो के द्वारा किया गया है।
मुलायम परिवार से जुड़ाव
अंबी बिष्ट का संबंध यूपी के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार से है। उनकी बेटी अपर्णा बिष्ट की शादी समाजवादी पार्टी के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे प्रतीक यादव से हुई है। प्रतीक यादव साधना गुप्ता और मुलायम सिंह यादव के बेटे हैं। इसी वजह से अंबी बिष्ट का राजनीतिक परिवार से जुड़ाव लंबे समय से चर्चा में रहा है।
अंबी बिष्ट करीब 25 साल तक लखनऊ नगर निगम में तैनात रहीं और जोनल अधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। इस दौरान उनका कई बार तबादला भी हुआ लेकिन हर बार आदेश रद्द हो गया। एक मौके पर तो वे तत्कालीन नगर आयुक्त अजय द्विवेदी से बैठक में ही भिड़ गई थीं, जिसके बाद उन्हें हटाने की सिफारिश तक हुई थी। बाद में वह लखनऊ विकास प्राधिकरण में भी संपत्ति अधिकारी के पद पर तैनात रही थीं।
फोरेंसिक रिपोर्ट से खुली पोल
फोरेंसिक जांच में यह साबित हुआ कि दस्तावेजों पर अंबी बिष्ट और अन्य अधिकारियों के हस्ताक्षर असली हैं। इसके बाद शासन को रिपोर्ट भेजी गई और मुकदमा दर्ज करने की अनुमति मांगी गई। शासन की मंजूरी मिलने के बाद विजिलेंस ने अब कार्रवाई शुरू कर दी है।
एफआईआर में नामजद अधिकारी
विजिलेंस की ओर से जो एफआईआर दर्ज की गई है, उसमें मुख्य आरोपी अंबी बिष्ट (तत्कालीन संपत्ति अधिकारी) बनाई गई हैं। उनके साथ जिन अन्य अधिकारियों को नामजद किया गया है, वे हैं –
- वीरेन्द्र सिंह (तत्कालीन अनुभाग अधिकारी)
- देवेंद्र सिंह राठौर (तत्कालीन उप सचिव)
- सुरेश विष्णु महादाणे (तत्कालीन वरिष्ठ कास्ट अकाउंटेंट)
- शैलेंद्र कुमार गुप्ता (तत्कालीन अवर श्रेणी सहायक)
इन सभी अधिकारियों के खिलाफ आरोप है कि उन्होंने मिलीभगत कर फर्जी रजिस्ट्रियां कीं और पात्र लाभार्थियों का हक छीना।
राजनीतिक बयानबाजी शुरू
मामले में अब राजनीति भी तेज हो गई है। चूंकि यह अनियमितताएं समाजवादी सरकार के वक्त की मानी जा रही हैं, इसलिए विपक्ष इस कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध बता रहा है। वहीं, वर्तमान शासन का कहना है कि यह कदम पारदर्शिता और जवाबदेही को सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया है।
अब आगे क्या?
विजिलेंस अधिकारियों के मुताबिक आगे की जांच में इस घोटाले में शामिल अन्य नाम भी सामने आ सकते हैं। विभाग ने कहा कि जिन असली लाभार्थियों को नुकसान हुआ है, उनकी शिकायतों को भी सुना जाएगा और अदालती कार्रवाई के जरिए दोषियों पर कठोर कदम उठाए जाएंगे।
इस कार्रवाई ने एक बार फिर लखनऊ विकास प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं और चर्चा छेड़ दी है कि किस तरह प्रभावशाली परिवारों से जुड़े लोग दशकों तक प्रशासनिक गलियारों में अपना दबदबा बनाए रखते हैं।




